Monday, November 7, 2016

पहचान अभी बाकी हैं 

क्या हुआ अगर मैं भी तुम्हारे साथ उड़ने लगा था
तुम्हारे कहने पर ही तो आसमानों से जुड़ने लगा था,
तुमसे छोटे ही सही, मगर पंख तो मेरे पास भी थे,
तुम्हे देखकर, क्या है यह  उड़ान, ये एहसास भी थे,  
थोड़ा सा ज्यादा क्या उड़ लिया पंख ही काटने लगे 
मेरी मस्त मौला उड़न में भी बारीकियां छांटने लगे 
मत काटो मेरे पंख, मुझमे उड़ान अभी बाकी है !

भूल गए वो झांझावात जो हमने साथ साथ झेला था 
जीवन के वो खेल जिनको हमने साथ साथ खेला था 
अब मेरी साँसे क्या मध्यम हुई तुमने अधमरा समझ लिया 
मेरे पुरे इतिहास को भुलाकर अब तो यह मरा समझ लिया  
मेरे मुरझाये  चेहरे से, मेरे जीतेजी मेरी मौत की आहट सुनने लगे
जब बंद होगी मेरी साँसे तो जलाने के लिए लकड़िया चुनने लगे 
मत जलाओ मुझे, मुझमे जॉन अभी बाकी है 

हालातो से जूझते हुए तुमसे ही सीखा था जीने का तरीका 
हम लोंगो ने साथ ही सीखा था अनजान रास्तो का सलीका 
तुम्हारे प्रोत्साहन पर ही तो पर्वत पर चढता चला गया 
पर्वत के दुर्गम, अनजान रास्तो पर बढ़ाता चला गया 
अब तुम्हे शिकायत है कि मैं क्यों चढ़ा जा रहा हु 
प्रयास तुम्हारा मुझे धकेल दो जो बड़ा जा रहा हु
मत धकेलो मुझे मुझमे ढलान अभी बाकी है

एक ही बगिया के तो फूल थे मैं  भी और तुम भी 
एक ही बात पर लहलहाते थे मैं भी और तुम भी 
तुम्हे देखकर ही तो सीखा  है मुस्कुराने का राज 
जो भी हु जैसा भी हु, तुम्हारी वजह से हूं आज 
पर क्यों मेरी मुस्कराहट को  भगाना चाहते हो 
मुस्कराहट मेरी पहचान इसे दबाना चाहते हो 
मत दबाओ मुझे, मेरी पहचान अभी बाकी हैं

जीवन की आँख मिचोली को साथ साथ हम खेले
यौवन की अंगड़ाई ली, घूमे हम जीवन भर के मेले
मेले की चकाचौध में कुछ तुम भूले कुछ मैं भुला
तुम भूले तो कोई बात नहीं पर मैं भुला तो क्यों भुला
बेवफाई के हर इल्जाम का इन्तहान  हो गया हु मैं
जा रहे हो  छोड़ कर क्यों कि बेईमान हो गया हु मै
मत जाओ मुझे छोड़ कर, मेरा ईमान अभी बाकी है


                                                                डा. रणजीत सिंह 'अविकल'

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