Monday, November 7, 2016

जुझता अकेला मैं 


जो कहते थे ज़िन्दगी गुजरे तेरी बाँहों में!
आज मेरी बातो से ही दम घुटता है !!

देखे है हमने भी कितने ही चेहरे!
तन्हाइयो के आलम में सब छुटता है !!

मस्जिद भी छुटटी है मंदिर भी छूटता है!
गीता क़ुरान बाइबिल गुरुग्रंथ छूटता है !!

जो खुदही को कभी ना जान पाए! 
वो भी अब मेरा हॉल चाल पूछता है!! 

गलती मेरी इतनी थी, देखा था एक सपना !
टूटता देख बार बार दिल ये सबब पूछता है !!

कभी सपने, तो कभी टूटी यादो में तुम!
और टुटा दिल अक्सर मुझे भी ढूंढता है !!

हालातो के द्वन्द में जूझता अकेला मैं!
तुम इतने कमजोर तो नहीं थे, दिल बार बार पूछता है !!

दिलको समझता हु यकीं होता है अक्सर !
मिलेगा तुझको एकदिन जिसे तू पूजता है !!

                                                 डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 

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