पहचान अभी बाकी है -३
छाया बनके तेरी तेरे साथ मैं चला
सपना बनके तु मेरी पलको में पला
जीवन के पतझड़ में पत्ते झड़ने लगे
देखकर मुझे मुह मुझसे मुड़ने लगे
पत्थर था तन आज साथ छोड़ने लगा
निज लहु का लौह इसे तोड़ने लगा
मत तोड़ो मुझे मुझमे चट्टान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकी है
गहराइयों का राज मुझसे तुमने जाना था
भंवरजाल से निकलने का मंत्र मुझे माना था
धरा बदल गयी तो मुझे मरा मान लिया
यथार्थ का अर्थ भूल मुझे मरा जान लिया
मेरी धाराओं को मुझसे ही काटने लगे
वेगहीन मान मुझे पाटने लगे
मत पाटो मुझे मुझमे ऊफान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकी है
बूढ़ा बूढ़ा कहते हो बूढ़ा हो चला
काम कोई जानु नहीं, बुरा न भला
बोझ उठाता था कभी आज बोझ बन गया
उम्मीद की किरण था आज छोभ बन गया
तूफानों भरी कश्ती, किनारे लगाना चाहो तुम
पूरी की पूरी हस्ती, भुलाना चाहो तुम
मत भुलाओ मुझे मुझमे तूफ़ान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकी है
डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
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