Monday, November 7, 2016


नैतिकता 

नित नयी नैतिकताएं पैदा करते मीडिया और बाज़ार
जन- उत्पादन करते सारे रेडियो, टीवी और अख़बार

मुझ जैसे कुछ मुर्ख करते है नैतिकता परखने का काम
पर नैतिकता तो बिकने लगी है बनकर चीज एक आम

रचे गए धर्मग्रंथ इसी नैतिकता के प्रचार में
बनायीं गयी कुछ जयंतिया इसी के प्रसार में

पर है तो वास्तव में, बस प्रदर्शन ही ये नैतिकता
दुकान के बाहर लगा बड़ा सा पोस्टर ये नैतिकता

आदर्शों की उम्मीदों से मेरा जीवन घुटता है 
उम्मीद में बैठे लोगो से नाता मेरा टूटता है
समझौते करते, संतुलन बनाते, आदर्श अब  सताते 
मेरा जीवन निकल रहा है अपनी जगह बनते बनाते

नैतिकता के नाम पे हमेशा होता है इस्तेमाल 
जो माने इसे तंगहाल, जो न माने वो मालामाल 

जब काम पूरा हो गया तो फेक दिया नैतिकता  
मूल्य सारे बदल गए, गयी तेल लेने ये नैतिकता  

कभी आदर्शो, कभी व्यवहारिकता में पिसती है नैतिकता 
जब शोषढ का कोई बहना नहीं तो काम आये ये नैतिकता 

तुम्हारी नैतिकता पर चलते चलते रास्ते का कचकड़ा हूं हो जाता
अपने आप से टूटते जुड़ते, घुटन के इसी बीच में बड़ा मैं हो जाता 

आज़ादी चाहू इस घुटन से, इन आदर्शो की राह है बड़ी टेढ़ी 
तेरे लिए व्यवहारिकता, और मेरे लिए ये बनी है राह की रेड़ी 

क्यों मानु मैं अपने लिए आपकी नैतिकता 
मेरे लिए मेरी अपनी खुद की है नैतिकता 

न दूंगा होने अपना इस्तेमाल पैदा करने को नैतिकता
न खोउ अपना अकेलापन, न बोझ लाद ये नैतिकता 


                                                               डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'

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