Monday, December 26, 2016

पहचान अभी बाकि है -७ 

आज तुम्हे लग रहा है, बढ़त है तुम्हारी 
बढ़ कर भी चुप रहना, ये आदत हमारी 
बढ़त पर मना लो जितना भी शोर गूल 
असलियत के आते ही जाओगे सब भूल 
रात का अँधियारा, सुबह होनी अभी बाकि
कुछ पल का रुझान ये, बात है पूरी बाकि 
मत आंको मुझे, मुझमे रुझान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

नयी नयी बातो से रोज हो छुभाते
लुभवाने वादों से मुझको लुभाते
रोज रोज ढूंढो नया एक बहाना
पूछू तो कहते हो नया ये जमाना
कब तक इन बातों से बहलाओगे
बिना बात के हवाइयां बनाओगे
मत रिझाओ मुझे, मुझमे परवान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

आज की रात तन्हा है, बेचैन है
बिखरा है मेरा सुख, और चैन है
हर वस्तु की एक कीमत होती है
चुकाने की भी एक नियत होती है
तन्हाइ की कीमत कैसे लगाओगे?
 बलिदान को मेरे कैसे भुलाओगे?
मत लगाओ मेरी कीमत, मेरा बलिदान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


   





Wednesday, December 7, 2016


पहचान अभी बाकि है - ६ 

अभी हमने सीखा चढ़ाइयों का राज 
अभी लगे मापने, कितना चढ़े आज   
अभी क्या बताये हम सीने का राज 
वक़्त हमारा आएगा तो छेड़ेंगे साज  
पहुंचकर हम दिखाएंगे चाँद पर तुझे
आज को देखकर ना चिढ़ाओ मुझे  
मत चिढ़ाओ मुझे, मुझमे चढ़ान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

बिखर मैं जाऊँ, आया वो पल नहीं
पटका मैं जाऊँ, वो 'अविकल' नहीं
 समय की बात, वो भी बदल जायेगा
   बदलते हुए, अपना भी समय लाएगा
नियति की बात, जो चढ़ा हूँ तेरे हत्थे
हाथ है बंधे, समझो मुझको निहत्थे
पर  तरकस में मेरे, तीर-कमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

 वक्त की मार है, सख्त है, कठोर है
कभी उधर है, तो कभी इस ओर है
चाहो तुम समर्पण, मेरे अरमान की
झुककर मैं मांगू, भीख दया दान की
इसी सख्ती में गिरेबान ना पकड़ लेना
मुझको तुम निराभिमान ना समझ लेना
मत आंको मुझे, मुझमे अभिमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

तुमने ही बताया था चुप रहने का तरीका
तुमसे ही सिखा खामोशियों का सलीका
मर्यादाओ के चलते सुनता रहा मैं सबकी
ज्ञात मुझे उत्तर, जबाब दे सकता कबकी
मैं निरुत्तर नहीं हूँ, बस तेरा मान रखता हूँ
पास मेरे है उत्तर, मुह में जबान रखता हूँ
निरुत्तर मत समझो मुझे, मुँह में जबान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


                                                              डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'

  




Wednesday, November 30, 2016

पहचान अभी बाकि है -५ 

कोई भी बात, रहता मैं ही गलत
बताते हमेशा, मुझे झूठ की लत
थोड़ा कहके आज थोड़ा रह गया
तेरी बातों के बीच रोड़ा रह गया
मुझको मज़ाक, उड़ाना जानों तुम
पूछने पर कह दो, बुरा न मानो तुम
मत उड़ाओ मेरी बातें, मुझमे सम्मान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

जिसे भी हमने चाहा, रुलाते चले हमें
कुछ हैं जो सपनों में, झुलाते चले हमें 
हमें खूब है अपनी हैसियत का अंदाज़ा 
 आँखों से तुम्हारी खैरात का भी अंदाज़ा
 छोटी है औकात, मगर बेदर्द नहीं हूँ
 जर्रो में रहता हु मगर खुदगर्ज़  नहीं हूँ
 मत मापो मुझे, मुझमे आसमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

वक्त मुड़ चला, सभी रूठने लगे 
वक्त की मार से, रिश्ते टूटने लगे 
मेरी हिम्मत हो कैसे तुम तोड़ोगे?
मुझसे तुम कब तक मुह मोड़ोगे?
रूठा वक्त फिर से मना लाऊंगा
जो कभी न हुआ वो बना लाऊंगा
मत रूठो मुझसे, मुझमे उत्थान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

                                                                   डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'








Tuesday, November 29, 2016



     पहचान अभी बाकि है-४ 

 मनुष्यों की दौड़, मनुष्यता से हीन 
व्यक्ति केंद्रित लोग व्यक्तित्व विहीन
सभ्य लोग रहें यहाँ सभ्यता से हीन
संमृध्दो की बस्ती में संमृद्धि विहीन 
सब से विहीन मैं, बाज नहीं आता हूं
इंसान हूँ, इंसानो के ही काम आता हूं 
भुलाओ नहीं मुझमे, इंसान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


बातों बातों में बताते थे बातों का राज
किसी बात के लायक न समझो आज
मुझसे ही तो सीखी थी बड़ी बड़ी बाते
राज, साज, नाज, जीवन की गूढ़ बाते
पूरी मेरी हस्ती मेरी मिटाना चाहो तुम
मतलब निकालकर झुकाना चाहो तुम
मत झुकाओ मुझे, मुझमे स्वाभिमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

रात का घना अँधियारा डराता है
बीती चांदनी रातें याद दिलाता है
पूनम जो होती तो चांदनी लपेटता
उम्मीद बातों की किरणे समेटता
उन यादों की याद, याद नहीं तुझे
कोशिश सदैव तेरी, समेट दे मुझे
मत समेटो मुझे, मुझमे जहान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

नमीं ला देती है, आँखों में याद तेरी
खलती है तुझे भी, सदैव कमी मेरी
घुटता रहता हुँ, किससे कहूँ मैं व्यथा
हर शख्स के अधरों पे अपनी कथा
निखरने की चाह, विखरता चला गया
दबे हुए अरमानों से शिहरता चला गया
मत दबाओ मुझे मुझमें अरमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


                                                   डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'







Sunday, November 27, 2016

पहचान अभी बाकी है -३ 

छाया बनके तेरी तेरे साथ मैं चला 
सपना बनके तु मेरी पलको में पला 
जीवन के पतझड़ में पत्ते झड़ने लगे 
देखकर मुझे मुह मुझसे मुड़ने लगे 
पत्थर था तन आज साथ छोड़ने लगा 
निज लहु का लौह इसे तोड़ने लगा 
मत तोड़ो मुझे मुझमे चट्टान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकी है 

गहराइयों का राज मुझसे तुमने जाना था 
भंवरजाल से निकलने का मंत्र मुझे माना था 
धरा बदल गयी तो मुझे मरा मान लिया 
यथार्थ का अर्थ भूल मुझे मरा जान लिया
मेरी धाराओं को मुझसे ही काटने लगे 
वेगहीन मान मुझे पाटने लगे  
मत पाटो मुझे मुझमे ऊफान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकी है 

बूढ़ा बूढ़ा कहते हो बूढ़ा हो  चला    
काम कोई जानु नहीं, बुरा न भला   
बोझ उठाता था कभी आज बोझ बन गया  
उम्मीद की किरण था आज छोभ बन गया 
तूफानों भरी कश्ती, किनारे लगाना चाहो तुम 
पूरी की पूरी हस्ती, भुलाना चाहो तुम 
मत भुलाओ मुझे मुझमे तूफ़ान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकी है 


                                                        डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 

   

Monday, November 21, 2016

पहचान अभी बाकी हैं-२

क्या हुआ जो तेरे साथ उड़ने लगा था
तेरे कहे पे आसमानों से जुड़ने लगा था,
तुमसे छोटे ही सही पंख मेरे पास भी थे,
देखकर तुझे उड़ानों के एहसास भी थे,  
ज्यादा जो उड़ लिया तो पंख काटने लगे 
बारीकियां उड़ान में तुम छांटने लगे 
मत छांटो मेरे पंख, मुझमे उड़ान अभी बाकी है !
                      मेरी पहचान अभी बाकी हैं 



भूल गए वो झांझावात जिसको हमने झेला था 
जीवन के खेल जिनको साथ हमने खेला था 
साँसे जो कम हुई कि तुमने अधमरा समझ लिया 
 इतिहास भुलाकर अब तो यह मरा समझ लिया  
मुरझाये  चेहरे से मेरी मौत की आहट सुनने लगे
मेरे जीतेजी जलाने के लिए लकड़िया चुनने लगे 
मत जलाओ मुझे, मुझमे जॉन अभी बाकी है
                           मेरी पहचान अभी बाकी हैं  

तुमसे ही सीखा था जूझना और जीने का तरीका 
साथ हमने सीखा था अनजान रास्तो का सलीका 
तेरे कहने पर ही तो पर्वत पर चढता चला गया 
पर्वत के अनजान रास्तो पर बढ़ाता चला गया 
अब जो शिकायत है कि मैं क्यों चढ़ा जा रहा हु 
प्रयास तुम्हारा धकेल दो जो बड़ा जा रहा हु
मत धकेलो मुझे मुझमे ढलान अभी बाकी है
                      मेरी पहचान अभी बाकी हैं 

एक ही बगिया के तो फूल थे मैं  और तुम 
एक ही बात पर लहलहाते थे मैं और तुम  
तुमसे ही तो सीखा  है मुस्कुराने का राज 
जो भी हु जैसा भी हु, तेरी वजह से हूं आज 
क्यों मेरी मुस्कराहट को  भगाना चाहो तुम 
ये है मेरी पहचान जिसे दबाना चाहो तुम  
मत दबाओ मुझे, मुझमे मुस्कान अभी बाकी हैं
                    मेरी पहचान अभी बाकी हैं 

जीवन की आँख मिचोली को साथ साथ हम खेले
यौवन की अंगड़ाई ली, घूमे हम जीवन भर के मेले
मेले की चकाचौध में कुछ तुम भूले कुछ मैं भुला
तुम भूले तो कोई बात नहीं पर मैं भुला तो क्यों भुला
बेवफाई के हर इल्जाम का इन्तहान  हो गया हु मैं
जा रहे हो  छोड़ कर क्यों कि बेईमान हो गया हु मै
मत जाओ मुझे छोड़ कर, मेरा ईमान अभी बाकी है
                         मेरी पहचान अभी बाकी हैं 


                                                                डा. रणजीत सिंह 'अविकल'

Friday, November 11, 2016

सर्जीकल स्ट्राइक 

सुबह उठा तो सुना, हमारी सेना ने किया सर्जिकल स्ट्राइक 
एक दिन सरकार ने किया काले धन का सर्जिकल स्ट्राइक

एक ही चाल में कर दिया पूरा का पूरा सिस्टम हमारा राईट 
देश का सिस्टम ठीक हुआ पर फैमिली में जारी रही फाइट 

सोचा सरकार इसके बारे में भी जरूर सोच रही होगी 
शायद इसके लिए भी जरुरी इंतज़ाम खोज रही होगी 

सुबह सुबह ही खबर आयी की उपाय सरकार ने सोच लिया 
हर घर में होने वाले झगड़े का कारण सरकार ने खोज लिया 

खबर आयी की पुरानी शादिया आज रात तक ही मान्य होंगी 
लोगो को आश्वासन दिया की घबराये नहीं जिंदगी सामान्य होगी 

आदेश आया की लोग अपनी पुरानी बीबी ससुराल में जमा कराये
सबको हैसियत के अनुसार नयी बीबी मिलेगी हाय तौबा न मचाये 

अगले दस दिनों के लिए सबको एक अंतरिम लुगाई दी जाएगी 
हालात काबू में होने पर इसकी समय सीमा और बढ़ाई जाएगी 

हमारे पड़ोस के ताऊ जी का तो ख़ुशी से बुरा हाल हो गया 
दूसरे ताऊ से ख़ुशी बर्दास्त न हुई और सुबह ही चल दिया 

मैंने पूछा ताऊ इतनी ख़ुशी क्यों है, बात क्या खाश है 
ताऊ जी बोले की बेवकूफ! बात तो खाश ही खाश है 

तेरी पुरानी  ताई के बदले सरकार नयी दिलाएगी 
नयी ताई तो दुगुने जोश के साथ बिजली गिराएगी 

रोना तो उनको चाहिए जिनके पास बहुत सा काला धन है 
नयी तो चाहिए पर पुरानी जमा करने का नहीं कोई साधन है

सड़क पर निकाला तो मिला जुला हाल था 
कोई ख़ुशी से पागल तो कोई बेहाल था 

एक सज्जन रोते हुए बोले बहुत मुश्किल से तो शादी हुई थी 
लुगाई का चेहरा भी ठीक से नहीं देखा, बात भी आधी हुई थी

फिर खबर आयी की १० दिनों बाद सबको अपनी वाली ही मिलेगी 
सिर्फ जिनकी एक से ज्यादा लुगाई थी बस उनकी ही कुर्की कटेगी 

देखते ही देखते पूरा माहौल बदल गया 
  ऐसा लगता मानो मौसम ही बदल गया

मैं भी अचानक उठा तो देखा मैं बिस्तर पे पड़ा था 
  घर का नौकर बिस्तर के पास चाय ले के खड़ा था  

                                                                  डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 




Monday, November 7, 2016

जुझता अकेला मैं 


जो कहते थे ज़िन्दगी गुजरे तेरी बाँहों में!
आज मेरी बातो से ही दम घुटता है !!

देखे है हमने भी कितने ही चेहरे!
तन्हाइयो के आलम में सब छुटता है !!

मस्जिद भी छुटटी है मंदिर भी छूटता है!
गीता क़ुरान बाइबिल गुरुग्रंथ छूटता है !!

जो खुदही को कभी ना जान पाए! 
वो भी अब मेरा हॉल चाल पूछता है!! 

गलती मेरी इतनी थी, देखा था एक सपना !
टूटता देख बार बार दिल ये सबब पूछता है !!

कभी सपने, तो कभी टूटी यादो में तुम!
और टुटा दिल अक्सर मुझे भी ढूंढता है !!

हालातो के द्वन्द में जूझता अकेला मैं!
तुम इतने कमजोर तो नहीं थे, दिल बार बार पूछता है !!

दिलको समझता हु यकीं होता है अक्सर !
मिलेगा तुझको एकदिन जिसे तू पूजता है !!

                                                 डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 
जनता माफ़ नहीं करेगी

आजकल फेसबूक पर देशप्रेम उमड़ रहा है 
ऐसा लगता है मानो पाकिस्तांन उजड़ रहा है 
चीन तो हमारे कमैंट्स से ही दब मर जायेगा 
चीनी सामान का बहिस्कार जल्दी रंग लाएगा 
पर बाज़ार में जाऊ तो चीनी सामान सस्ता है 
कम बजट में और कुछ नहीं दिख रहा रस्ता है 
दिल तो देश भक्त है, जेब देशद्रोह करवाती है
फेसबुक, ट्विटर कर सिर्फ देशभक्ति दिखने वालो 
जनता माफ़ नहीं करेगी

स्मार्ट फ़ोन चायनीज़ रखु, क्योकि वो सस्ता है
चीनी को मिला है ठीका, नया वाला जो रस्ता है
तेल की खुदाई हो या अत्याधुनिक बड़े सामान
चीन सब कर रहा, देशभक्त गण करे आराम
पर २० रुपये की झालर देशद्रोह करवाती है
देशभक्तो द्वारा आरोप राजद्रोह का लगवाती है
सिर्फ झालर का बहिस्कार कर चीन को सबक सीखने वालो
 जनता माफ़ नहीं करेगी

उम्र भर जिसने राजा का बस गुणगान किया 
बदले में अपने लिये मनचाहा वरदान लिया 
औरो के लिए मूल्यों की बाते करे 
पर अपने ऊपर लागु कुछ न करे 
शोध कोई करे, नाम इनका भी छपे 
शोध करने की कूबत न इनके कुबे 
दिल तो नैतिक, पर कम बुद्धि अनैतिक बनाती है 
अपने सिर्फ भाषणों में नैतिकता की बाते करने वालो 
जनता माफ़ नहीं करेगी

पुरे बरस जम के पानी बहाना 
होली पे याद आये पानी बचाना 
सालभर पूरा दिन एसी और कूलर चलाये 
   दिवाली में कहे चलो पर्यावरण को बचाये
इन मशीनो के बिना चलता नहीं काम है 
स्वास्थ्य ठीक हो तो ये सब कुछ हराम है 
दिल में है प्रदुषण घटाना, पर अस्वस्थता इसे बढ़ाती है 
सिर्फ जबान से ही पर्वावरण का उपदेश देने वालो 
जनता माफ़ नहीं करेगी

मंगरुआ आज रात बैठा है अंधेरे में
उनके घर में होगा उजाला सबेरे में
उसके घर की बिजली, बोर्ड ने काट दी
उसके सारे अरमानो पर स्टीकर साट दी
उसके पुरे साठ रुपये बकाये थे
जो उसने अबतक नहीं चुकाए थे
दिल तो उसका ईमानदार है, जेब दोषी बनाती है
साठ रुपये से बिजली बोर्ड का घाटा पूरा करने वालो
जनता माफ़ नहीं करेगी


उसके घर में रोशनी आ रही है, छन के रोशनदान
सेठ जी के घर से, उनका भी है बड़ा ऊँचा खानदान
उनके कारखाने का भी बिजली बिल बकाया है
कई सालो से उन्होंने भी बिल नहीं चुकाया है
उनका बिजली बिल माफ़ करने का प्रस्ताव है सरकार के पास
कर्ज देने, बेलआउट पैकेज देने के सुझाव भी है सरकार के पास
बिल छोटा हो तो दोषी, बड़ा हो तो सरकार को हिला देता है
गरीबो का हक मार, अमीरो को बेलआउट पैकेज देने वालो
जनता माफ़ नहीं करेगी 
   
                                                                   डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
पहचान अभी बाकी हैं 

क्या हुआ अगर मैं भी तुम्हारे साथ उड़ने लगा था
तुम्हारे कहने पर ही तो आसमानों से जुड़ने लगा था,
तुमसे छोटे ही सही, मगर पंख तो मेरे पास भी थे,
तुम्हे देखकर, क्या है यह  उड़ान, ये एहसास भी थे,  
थोड़ा सा ज्यादा क्या उड़ लिया पंख ही काटने लगे 
मेरी मस्त मौला उड़न में भी बारीकियां छांटने लगे 
मत काटो मेरे पंख, मुझमे उड़ान अभी बाकी है !

भूल गए वो झांझावात जो हमने साथ साथ झेला था 
जीवन के वो खेल जिनको हमने साथ साथ खेला था 
अब मेरी साँसे क्या मध्यम हुई तुमने अधमरा समझ लिया 
मेरे पुरे इतिहास को भुलाकर अब तो यह मरा समझ लिया  
मेरे मुरझाये  चेहरे से, मेरे जीतेजी मेरी मौत की आहट सुनने लगे
जब बंद होगी मेरी साँसे तो जलाने के लिए लकड़िया चुनने लगे 
मत जलाओ मुझे, मुझमे जॉन अभी बाकी है 

हालातो से जूझते हुए तुमसे ही सीखा था जीने का तरीका 
हम लोंगो ने साथ ही सीखा था अनजान रास्तो का सलीका 
तुम्हारे प्रोत्साहन पर ही तो पर्वत पर चढता चला गया 
पर्वत के दुर्गम, अनजान रास्तो पर बढ़ाता चला गया 
अब तुम्हे शिकायत है कि मैं क्यों चढ़ा जा रहा हु 
प्रयास तुम्हारा मुझे धकेल दो जो बड़ा जा रहा हु
मत धकेलो मुझे मुझमे ढलान अभी बाकी है

एक ही बगिया के तो फूल थे मैं  भी और तुम भी 
एक ही बात पर लहलहाते थे मैं भी और तुम भी 
तुम्हे देखकर ही तो सीखा  है मुस्कुराने का राज 
जो भी हु जैसा भी हु, तुम्हारी वजह से हूं आज 
पर क्यों मेरी मुस्कराहट को  भगाना चाहते हो 
मुस्कराहट मेरी पहचान इसे दबाना चाहते हो 
मत दबाओ मुझे, मेरी पहचान अभी बाकी हैं

जीवन की आँख मिचोली को साथ साथ हम खेले
यौवन की अंगड़ाई ली, घूमे हम जीवन भर के मेले
मेले की चकाचौध में कुछ तुम भूले कुछ मैं भुला
तुम भूले तो कोई बात नहीं पर मैं भुला तो क्यों भुला
बेवफाई के हर इल्जाम का इन्तहान  हो गया हु मैं
जा रहे हो  छोड़ कर क्यों कि बेईमान हो गया हु मै
मत जाओ मुझे छोड़ कर, मेरा ईमान अभी बाकी है


                                                                डा. रणजीत सिंह 'अविकल'
क्यों तुम्हे ऐतराज है?

क्यों तुम्हे ऐतराज है?
मेरी नजदीकी से
भूल गये जब भरी महफ़िल में, मेरा साथ पकड़ा था
हालात की तन्हाइयो में मेरा हाथ जकड़ा था

क्यों तुम्हे ऐतराज है?
मेरी बातो से
भूल गये जब मेरी एक एक बात पे ठहाके लगाया करते थे
आज आने में देर की यह शिकायत भी दर्ज कराया करते थे
क्यों तुम्हे ऐतराज है?
मेरे अपनेपन से
क्या तुम्हे याद नहीं जब घंटो दिल की गहराइयो में झाँका करते थे
घंटे, दिन, सप्ताह कैसे बित जाते थे पर कभी नहीं आँका करते थे

वो रातो का जगाना,
अपने दोस्त को सताना
तुम्हारा रूठना
मेरा मनाना

सब कुछ बहुत याद आते है
यादो में बहुत सताते है

पर सोचता हु, वो सारे पल क्या सिर्फ तुम्हारे थे
वो हसीन, प्यारे लम्हे तुमने जो मेरे साथ गुजारे थे

शायद तुम भी उन यादो के सहारे ही रहते होगे 
याद मुझे कर कर के गमो को पी के रहते होगे
लेकिन इतना मुझे बिस्वास है,
इस बात का आभास है
आओगे तुम एकदिन जरूर
तुम्हारे बिना ये जीवन निस्वास है

                                                                 डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 
समझ 

समझते तुम भी  हो
समझते हम भी है
फिर भी समझ नहीं आता
की ऐसा क्यों समझते है?

कभी हम तुमको समझाते है 
कभी तुम हमको समझाते हो 
फिर भी समझ नहीं आता 
कि हम क्यों नहीं समझते है?

समझने की बस बात इतनी है 
समझ को समझ कर समझा करे 
पर अपनी समझ को कैसे समझाये?
कि सोच समझ कर समझा करे 

लेकिन फिर समझता हु 
की इतना भी क्या समझना 
समझ को जो समझ में आये 
इतना ही बस समझता हु

समझ को जितना समझु
उतना ही समझता हु
समझ बड़ी नासमझ है
पर दिल ये नहीं समझता है

ये समझ चीज बड़ी है समझने की 
जो जल्दी समझ नहीं आती 
समझ में जिसके आ जाये 
उसे क्या पड़ी है समझने की?


...                                डा. रणजीत सिंह 'अविकल'
तड़प 
हर तड़प की यहाँ पर एक, अधूरी सी कहानी है 
तड़प के साथ जीते है, बस हाथो में निशानी है 
तुम्हारी और हमारी तड़प में बस शेष इतना है 
तड़प का रिश्ता अब हमारा, होने लगा रूहानी है

तड़प के साथ पूरी रात तड़पते हुए ही गुजरी है 
उसी की याद आँखों में एक पल भी न बिसरी है 
कैसा हाल रातो का कर डाला इस बेहया तड़प ने 
कि सबकी सो के गुजारी है, हमारी रो के गुजरी है

तड़पता हु तुम्हारे बिन, हालत कुछ हुई अजीब
तुम जो साथ मेरे हो, तो मेरा सब कुछ है हबीब
इस तड़प ने कैसा हाल तड़पाकर बना डाला
सब कुछ साथ मेरे है, पर तुम बिन हुआ गरीब

तड़प आँखों में दिखती है, तड़प की सच्चाई है
भगाने से भी ना जाये, गजब इसकी बेहयाई  है
तड़प के साथ और बेसाथ में बस फर्क इतना है
तड़प ना थी तो तन्हा थे, तड़प जो है तो तन्हाई है

तड़प के साथ अपनी, अलग सी ही कहानी है 
हमे बिस्वास है हमको, मिलेगा जो जहानी है  
हमे मालूम है एक दिन तड़प से नाता टूटेगा, 
आँखों में है गंगाजल, और उम्मीदों का पानी  है

                                                                डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 
दिन में तारे नज़र आने लगे

जो कहते थे किस्मत मुट्ठियों में बंद है, 
आज वो भी मंदिरों के चक्कर लगाने लगे 
उनकी नींद उड़ गयी, उनका चैन खो गया  
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे 

ये वही लोग है, ये वही शक्श हैं 
जो कहते थे प्यार व्यार कुछ होता नहीं 
ये महज बाते बड़ी है काम कुछ भी नहीं 
आज वो भी इश्क़ के मारे नज़र आने लगे 
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे

मुझे अब भी याद है, उर में दफन राज है 
राज करते थे वो, कहते थे अपना ही राज है 
अपने लिए अलग सड़के बनाते थे वो 
आज वो भी सड़क पर नज़र आने लगे 
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे

हमेशा से उसने ज़मीर से बेवफाई की 
किसी की भी ना हौसला अफजाई की 
 आज मेरी बाते बताते, चर्चे सब की सुनाते   
अब वो भी मेरे रंग में रंगे नज़र आने लगे 
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे

  जो कहते थे की दुनिया है बस मेरी मुट्ठी   
अपने दम पर कर दे किसी की भी छुट्टी 
समय की चाल देखो, कि वो भी बेहाल है
वो भी भरी भरी आँखों में नज़र आने लगे 
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे
,
 वो अर्जुन, वो सिकंदर वो था अकबर महान 
 जीतता रहा अपने भुजबल से सारा ये जहांन 
समय का चक्र देखो, क्या से क्या हो गया 
अपने दर पे वो भी छटपटाते नज़र आने लगे
उन्हें भी दिन में तारे नज़र आने लगे


                                                             डा. रणजीत सिंह 'अविकल'
पूर्व राष्ट्रपति कलाम जी की जयंती पर एक श्रद्धांजलि  


अलविदा 

सिसक रही है गीता
कुरान रो रहा है
हर हिन्दू, हर सिख 
हर मुसलमान रो रहा है 
क्योकि गिर पड़ा है एक वटवृक्ष  
बोलते-बोलते अचानक धड़ाम से
फिर कभी नहीं उठने के लिए
फिर कभी नहीं लहलहाने के लिए 
वृक्ष जो हमारा गुमान था
आँखों में शोध का उफान था  
वृक्ष जो रत्न था
वृक्ष जो शक्तिपुंज था 
वृक्ष जो कला कुञ्ज था 
 बोले तो भी
खिलखिलाहट बिखेरता था 
बौखलाहट समेटता था 
चीर देता था हर सन्नाटे का सीना
था वो हमारी अंगूठी का नगीना 
सियासत से कोसों दूर
अन्वेषण के अनंत नशे में चूर
वृक्ष अब नहीं उठेगा कभी
अंकुरित होंगे उसके सपने
देशवासियो की आँखों में 
जो थे उसके अपने 
उठेंगी उसकी मिसाइले  
इसी जमीन से
उगलने को जहर 
शान्ति के दुश्मनों के लिए 
बनके बरसेंगी कहर 
वतन के दुश्मनो के लिए 
उन्हें सबक सीखने के लिए
 वृक्ष क्या कभी गिर सकते है? 
गिर कर कभी मर सकते है?
  वृक्ष कभी मरते नहीं
मौसमो से डरते नहीं  
सदैव अंकुरित होते रहते हैं
पल्लवित होते  रहते है 
अपने नए-नए पल्ल्वों के साथ
वे किसी के अब्दुल होते हैं
किसी के कलाम 
अलविदा .अलविदा ,अलविदा