जल्दी चली जाती है
एक दिन अकेला अपनी मस्ती में अड़ा
विस्वविद्यालय के गेट पे खड़ा
अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था
घर कैसे जाऊ यही बिचार कर रहा था
कि अचानक एक मुस्कुराता सा चेहरा
मेरी तरफ देखता नज़र आया
उसकी चुलबुली सी निगाहों में
मेरी आने वाली जिंदगगी का सफर नजर आया
मैंने घबरा कर दाये देखा, बायें देखा
आगे देखा, पीछे देखा
जहाँ नहीं देखना था वहां भी देखा
जहाँ नहीं देखना था वहां भी देखा
मैं कन्फर्म कर रहा था
कि वो मुझे ही देख रही थी
मेरे प्यार की ख्याली नैया में
वो गोते लगा रही थी
मैंने सोचा कि इससे पहले
अपने होश ना खो दू
चल के उसको
अपने आगोश में ले लूँ
लेकिन जैसे ही मुड़ा
वो मुस्कुराता सा चेहरा जा चुका था
मेरे दिल के सारे के सारे
अरमान खा चूका था
सोचा आज नहीं तो
कभी और सही
कभी और नहीं तो
कभी और सही
सूना है ओपपोर्टुनिटी बार बार आती है
सूना है ओपपोर्टुनिटी बार बार आती है
आकर अक्सर अपनी झलक दिखला जाती है
लेकिन इतने बरस बाद भी उसकी झलक नहीं आयी
सबकी आती होगी लेकिन मेरी ओप्पोर्तुनिटी नहीं आयी
अब सुबह सुबह मेरी बीबी की
मधुर आवाज कानो में गूंजती है
बच के ना रहो तो
झाड़ू और बेलन से भी पूजती है
ओप्पोर्तुनिटी देर से आती है
यह तो पता था
यह तो पता था
लेकिन आ के इतनी जल्दी चली जाती है
ये नहीं पता था
ये नहीं पता था
इसीलिए कहता हूं
इस ओप्पोर्तुनिटी की दस्तक को पहचानो यारो
वक़्त पे इसकॊ पहचान कर संभालो यारो
डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
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