Monday, November 7, 2016

जल्दी चली जाती है

एक दिन अकेला अपनी मस्ती में अड़ा 
विस्वविद्यालय के गेट पे खड़ा 
अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था
घर कैसे जाऊ यही बिचार कर रहा था  

कि अचानक एक मुस्कुराता सा चेहरा 
मेरी तरफ देखता नज़र आया 
उसकी चुलबुली सी निगाहों में
मेरी आने वाली जिंदगगी का सफर नजर आया 

 मैंने घबरा कर दाये देखा, बायें देखा
आगे देखा, पीछे देखा
 जहाँ नहीं देखना था वहां भी देखा 

मैं कन्फर्म कर रहा था
कि वो मुझे ही देख रही थी 
मेरे प्यार की ख्याली नैया में 
 वो गोते लगा रही थी 

मैंने सोचा कि इससे पहले  
अपने होश ना खो दू 
चल के उसको 
अपने आगोश में ले लूँ 

 लेकिन जैसे ही मुड़ा 
वो मुस्कुराता सा चेहरा जा चुका था 
मेरे दिल के सारे के सारे 
अरमान खा चूका था 

सोचा आज नहीं तो 
कभी और सही  
कभी और नहीं तो 
कभी और सही  

सूना है ओपपोर्टुनिटी बार बार आती है 
सूना है ओपपोर्टुनिटी बार बार आती है
आकर अक्सर अपनी झलक दिखला जाती है 

लेकिन इतने बरस बाद भी उसकी झलक नहीं आयी 
सबकी आती होगी लेकिन मेरी ओप्पोर्तुनिटी नहीं आयी 

अब सुबह सुबह मेरी बीबी की 
मधुर आवाज कानो में गूंजती है 
बच के ना रहो तो 
झाड़ू और बेलन से भी पूजती  है 

ओप्पोर्तुनिटी देर से आती है
यह तो पता था 
लेकिन आ के इतनी जल्दी चली जाती है
 ये नहीं पता था 

इसीलिए कहता हूं 
इस ओप्पोर्तुनिटी की दस्तक को पहचानो यारो 
वक़्त पे  इसकॊ पहचान कर संभालो यारो 

                                                                                     डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 

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