Saturday, December 23, 2017

बेकार 

आज मेरी तन्हाई ने 
तन्हाई में आकर कहा 
कसम खाओ
कि कसम न दोगे 


मेरे ह्रदय ने पूछा 
ऐसा क्यों?

तो उसने कहा 
डर लगता है 
इन कसमों से, 
रसमों से, 
वादे, इरादे 
सब बेकार की बातें हैं 

मैंने कहा,
बेकार तो हैं 
बेकारी में ही तो बेकरारी है 
और इस बेकरारी 
का ही तो करार है 
मेरे और तुम्हारे बीच 
जो लाता है हमें खींच 

उसने कहा 
लेकिन बेकार तो बेकार है 
और तुम्हारा भी तो घर बार है 
मुझे बेकार में और 
नहीं होना बेकरार 

मैंने याद दिलाना चाहा 
उन बेकार की घड़ियों को 
जो हमने बेकार की थी
वो सारे बेकार लम्हे 
स्वीकार है 
पर यह सच्चाई अस्वीकार है 

मैंने पूछा 
कुछ याद आया 
कुछ इश्कियां याद आयी 
क्या शिस्कियाँ  याद आयी?

उसने कहा 
धत, बेशरम 
ये भी कोई याद करता है 

मैंने पूछा 
तो तुम्हारा चेहरा लाल क्यों है?
लगता है यादों से मालामाल है 

इतना कहना था कि 
तन्हाई रो पड़ी 
जो दिवार बन रही थी 
वो खो पड़ी 
और कहा 
चलो ना कहीं दूर 
जहाँ कोई आता जाता नहीं  


Saturday, December 2, 2017


कुछ तो सत्यता रही होगी 


कुछ तो रिक्तता रही होगी 
या कमी परिपक्वता की होगी 
यूँ ही तो दहलीज पार कर नहीं जाता 
कोई दर्दे गम किसी से बाँट नहीं जाता 
इन सब में कुछ तो सत्यता रही होगी 

कुछ  तो तमासे हुए होंगे 
कुछ तो हादसे भी हुए होंगे 
यूँ ही तो कोई तमासा दिखता नहीं 
तमाशाई से तमासा बनता नहीं 
इन तमासों में कुछ तो सत्यता रही होगी 

कुछ तो अनुभूतियाँ रही होंगी 
कुछ परिस्थितियां भी रही होंगी 
यूँ ही तो कोई बेवफा होता नहीं  
बेवजह कोई खफा होता नहीं  
बेवफाइयों में भी कुछ तो सत्यता रही होगी

कुछ तो बात रही होगी
कोई बात जो नहीं बनी होगी
यूँ ही तो बात बिगड़ती नहीं
बनते बनाते फिर बिगड़ती नहीं
बगड़ती बातों में बातों की कुछ तो सत्यता रही होगी 

                                                                                    डॉ रणजीत सिंह 'अविकल'






Tuesday, August 8, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -२० 

हर पल रहो करते अपमान मेरा
अंत तेरी दृष्टि में पूरा सम्मान मेरा
मान नहीं मेरा, सम्मान तेरा कैसा
कुछ मैं न बोलू तो अपमान कैसा 
मान तेरा करता तुम अपमान बोलो
जहर ही बिखेरो जब भी मुँह खोलो
मौन हो के सुनु मैं तेरी बातें क्योकि 
मेरा दंडविधान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है 

Saturday, August 5, 2017

ज़िन्दगी भर राजा की दलाली करने वालो
उनके रबर स्टाम्प जैसा काम करने वालों
बदले में सारी सारी सुविधाएँ लेने वालों
रिसर्च में नैतिकता का ढोंग करने वालों
रिसर्च के नाम पर काला धब्बा बनने वालों
जनता माफ़ नहीं करेगी


भगवान् इस दुनिया को उन अच्छे लोगो से बचाओ जो अच्छे बैलों  तरह बुद्धि रखते है 

Sunday, July 23, 2017




संभाला है दर्द हमने, आंसू भी बहाए हैं
इस कदर प्यार करके दर्द ही कमाए है 
वजह भले तुम ठहरे, दिल तो हमारा था
वो भी तुम ले गए, सुख चैन भी गवाएं हैं 

प्राणप्रिये, तू ऐसे उदास न हुआ कर
तुझसे दूर हो जाऊ न ऐसी दुआ कर 
कोई तुझे देखे तो मुझे जलन होती है
हवाओ, मेरे प्रियतम को न छुवा कर


इस ज़माने का भी अजीब सा दस्तूर है 
दर्द, दवा बन कर हर जगह मशहूर है 
दर्द जो सुनाओ तो तालियां बजती है 
इसमें न ही तेरा, न कोई मेरा कसूर है 



Monday, July 17, 2017



मेरी पहचान अभी बाकि है -१९ 

गिरू जहाँ, वहां राख कर दूँ 
मैदान सारा, मैं साफ़ कर दूँ 
कुटिया, महल, धनी, गरीब 
जलना है रहूं जिसके करीब 
करूँ ना कोई भेद भाव
ना ही कोई लग लगाओ  
जलाना सिर्फ जानू, क्योंकि अग्नि हूँ मैं 
मेरा काम यही बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


सलाह सब देते की बात करो 
इससे करो, उससे करो, बात करो 
काम बिगड़ जाये तो बात करो 
बाते ही करे और कहें बात करो 
बात करते रहो, बात बनती नहीं 
इसीलिए तुझसे मेरी कभी बनती नहीं 
जंबान मेरे मुँह में पर जीवन संग्राम अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है  

Tuesday, July 11, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है - १ ८  


करता तुम्हारी कब से प्रतीक्षा 
कब से है तेरे दर्शन की इच्छा 
हर बार लगता अब आओगे 
बन के बदरिया छा जाओगे 
पर अब तक तुम आये नहीं 
तुम्हे यहाँ ढूँढू, तुम हो कहीं 
इच्छा न छोड़ू, प्रतीक्षा न छोड़ू, 
 धैर्यवान मुझमे अभी बाकी है 
मेरी पहचान अभी बाकी है


प्रियतम सभी के आने लगे
गीत प्रीत के गुनगुनाने लगे
प्राणप्रिय मेरे कब आओगे
ठंढी सी छाँव बन छाओगे
वचन तो दिया था आने को
मत लाओ किसी बहाने को
आना पड़ेगा तुझे मेरी गली,
तेरी यादों का मकान यहाँ बाकी है
मेरी पहचान अभी बाकी है


कब आने वाले हो, जरा बतलाओ
क्या लाने वाले हो, जरा बतलाओ
जब भी आना, मुस्कुराते हुए आना
गले से लगाना, कही फिर न जाना
उंगली पकड़ कर बाग़ में घुमाना
मुझको पढ़ाना, कहानी भी सुनाना
देर करना नहीं, मेरा इंतहान अभी बाकी है
मेरी पहचान अभी बाकी है
 






Thursday, June 15, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -१७ 

तुमने मुझको चढ़ते देखा 
गिरते देखा, लड़ते देखा 
तिल-तिल करके मरते देखा 
पून: लोहे जैसा ढलते देखा 
जीवन की यही कहानी है 
सब अपने में मस्तानी है    
जिन्दा होने की है पहचान, 
और जीवन का निशान यही बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुमने मुझे उलझते देखा
अपने आप सुलझते देखा
बिन बातों के उबलते देखा
कड़वा घूंट निगलते देखा
बिन बैसाखी संभलते देखा
बगिया बीच टहलते देखा
देखे मेरे रूप अनेको पर मेरे
उत्कर्ष का गुणगान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुमने मुझको टूटते देखा
टूट टूट करके जुटते देखा
अभिमन्यु जैसा रण कौशल
चक्रव्यूह का घिरा रणस्थल
चक्रव्यूह से भी निकलते देखा
जयद्रथ का वध करते देखा
अर्जुन का लहू नशों में मेरी
मेरा महान रक्तदान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है









Tuesday, May 23, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है-१६  

रोम-रोम में रचि तेरी यादों की रचनाये  
तन्हाई भी न तन्हा, रहने दे, क्या बताये?  
उन रातों का जागना, रूठना, मानना 
तेरा लिपटना, बतियाना, घंटों बिताना 
सख्ती दिखाना, बड़ी बड़ी बाते संजोना  
पर अकेले में तेरे आँचल में छुपके रोना 
यादें है मेरी और इन यादों का मकान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


एकांत में होता अनुभव एकाकीपन का
एकांत बताये मोल तेरे संग जीवन का
प्यार, तकरार, मनुहार सब कुछ तुझसे
ज्ञान, अज्ञान, विज्ञान और शान भी तुझसे
समय हवा की तरह गुज़रे जब तू साथ हो
कुछ नहीं चाहिए बस हाथों में तेरा हाथ हो
क्या-क्या सुनाऊँ, तेरे संग जीवन का गान बहुत बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


चाँद की चांदनी जैसी तेरी चंचलता
महान मार्तण्डय की तरह सरलता
फिर भी गुमान नहीं अपने होने का
जरा भी शिकन नहीं कुछ खोने का
मालुम है कि तुम सूरज सा चमकोगे
ईश्वर की फुलवारी में फूल सा महकोगे
तुझसे मिलेगी हमें भी पहचान, सितारों में तेरा स्थान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है





    


Sunday, March 26, 2017


पहचान अभी बाकि है - १५ 


रास्ते न दिख रहे, कोहरा घना सा है
आस लगी टूटने, मन अनमना सा है 
घनघोर बादलों बीच झांकती अजोर है 
हर पल बताये होनेवाली जल्दी भोर है 
जीवन से भरपूर जिंदगी का साथ है
परायों संग कुछ अपनों का भी हाथ है 
शक्तिविहीन मत समझो, मुझमे शक्तिमान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है 


रास्ते न दिख रहे, फिर भी हमे चलना है 
बाधाएं पग पग पर फिर भी हमें बढ़ना है 
मरने के सौ बहानें फिर भी हमें जीना है 
जीवन के जहर को अमृत समझ पीना है 
परिस्थिति झुकाए फिर भी नहीं झुकना है
आगे बढ़ते रहना है कही नहीं रुकना है
अँधेरे में घिरा हूँ पर मेरा उदीयमान अभी बाकि है 
                                                               मेरी पहचान अभी बाकि है


ध्वंस के बीच करूँ इस धरा का पुनर्निर्माण
उत्थान पतन के बीच होगा चीर का निर्माण
इसी बीच दधीच की तरह हड्डिया गलायेंगे
अब तक जो नहीं हुआ, कर के दिखलायेंगे
प्यास लगी तो रेत निचोड़ जल निकालेंगे
धरा के धरातल पर धामिनी रंग खिलालेंगे
निःशक्ति हूँ पर मरा नहीं, मुझमे प्राण अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है 



  





Tuesday, March 14, 2017


मेरी पहचान अभी बाकि है-१४ 

ताक पे सारे नियम रखे, इन चोरो की टोली ने 
देखो कुछ छूटे न, भिखमंगों तक की झोली में 
ये सारे के सारे चोर देखो साहूकार बने बैठे हैं 
अजब चाल इनकी देखो, किस तरह से ऐंठे हैं 
चोरी खुद ये करे, और इल्जाम हम पर लगाए 
अपनी छिछोरी हरकतों के तीर हम पे चलाये 
मत लो मेरे सहन की परीक्षा, मेरा शस्त्र संधान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


औरो से बस लिखवाया, कभी तो खुद से लिखा करो
दूसरों से बस सिखलाया, कुछ तो खुद से सीखा करो
जिसके लिए यहाँ आये हो, थोड़ा वो भी किया करो
भक्ति करके जीते आये, कभी तो खुद से जिया करो
मुझे तो तुम तौल रहे हो, खुद को भी तुम तौला करो
 स्वामी भक्ति छोड़छाड़ के, कभी तो मौला मौला करो
भक्ति की उम्मीद मुझसे रक्खो नहीं, मेरा आत्मसम्मान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है








Sunday, March 5, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -१३ 



गड़ा हूँ जमीन में, पड़ा पहचानहीन मैं 
कलरव है डाली पर, खुद शब्दहीन मैं 
धुप लगे तुझको, पर सर्द मेरी फ़ितरत 
सर्दी लगे तुझको, तो दर्द मेरी जिगरत 
न कोई बिषाद की तनाएँ क्यों उन्मुक्त  
जकड़ा खुद अँधेरे में पर तुम परिमुक्त 
लहलहा रहे हो तुम, क्योकि मेरा विषपान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

शक्तिपुत्र हूँ मैं, सीने में लिए भक्ति
मृत्युंजय मैं, बाजुओ में बाकि शक्ति
अर्जुन मै, गांडीव मैं, पिनाक भी मैं
राम मै, परशुराम मै, सारंग भी मैं
नव जुग, नव आलोक का पथिक मैं
अनकही बातों का उत्तर हूँ सटीक मैं
वक्त मेरे कुछ दिन तो ठहर, मेरी मुरली की तान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

बादल हूँ आवारा, मैं दीवाना हूँ
अपनी ही मस्ती का मस्ताना हूँ
मालूम नहीं कहाँ से गुज़रना है
ये भी न जानू कहाँ पे बरसना है
भयावह लगूँ, पर जीवन से भरा
रूठजाउ तो सूखा, नहीं तो हरा
पागल मत समझो मुझे, मुझमे सृष्टि का वरदान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

                                                                     
                                                                                  डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'





Monday, February 20, 2017

पहचान अभी बाकि है-१२ 


संघर्षपूर्ण अतीत, पर उचाईयां भी महान थी 
लड़े, जीते, वो लड़ाइयां भी कहाँ आसान थी 
हौसलो की उड़ान थी, उड़ान में भी जान थी 
बादलों के ऊपर उड़ना ही मेरी पहचान थी 
नभ में  मेरी झांकी, मुस्कान अब भी बाकि है 
आज भी जिन्दा हूँ, मेरी जान अब भी बाकि है 
 मत समझो मुझे अतीत का साया, मेरा वर्त्तमान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

चर्चे खूब चलते थे, शहर भर में हमारे
प्रसंशा मेरी रहती थी, अधरों पे तुम्हारे
चाहते थे तुम भी चलना मेरी ही राह पर
पर चल ना पूरा पाए ह्रदय से चाह कर
चल नहीं पाए तो हो गयी राह ही ख़राब
हर बात पर बताओ, तुम ठीक मैं ख़राब
अपमान और करना नहीं, मुझमे आन अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

बाजुओं में जोर था, नाम चारो ओर था 
लड़ाइयां थी सामने, ना ही कोई चोर था 
लड़ना क्या छोड़ा, तुमने हारा मान लिया
 सरलता से तुमने मुझे, बेचारा जान लिया
विश्राम बस है, लड़ाइयों से थका नहीं हूँ,
आते है सारे दाँव-पेच, कही छका नहीं हूँ 
हड्डियों में अब भी जोर, मुझमे पहलवान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

भंवरजाल में उलझकर जटिल हुआ मैं 
समय के कुठाराघात से चोटिल हुआ मैं 
अपने को जानों नहीं, हाल मेरा पूछते हो 
अपना कोई समाधान बिन मांगे ठूंसते हो 
भांन मुझे भंवरजाल से भागने का सलीका  
भांति भांति के भामाशाहो से बेहतर तरीका 
भरोशा है निकलने का इस जाल से, मेरे ह्रदय का समाधान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है






  












   






Tuesday, February 14, 2017


पहचान अभी बाकि है-११ 

नैतिकता के नाम पे हमेशा होता मेरा इस्तेमाल 
जो माने इसे तंगहाल, जो न माने वो मालामाल
दुकान के बाहर लगा बड़ा पोस्टर ये नैतिकता
काम पूरा हो गया तो गयी तेल लेने ये नैतिकता
सब कुछ जानकार भी इससे अंजान बने बैठा हूँ
माना इस्तेमान किया, इसका संज्ञान लिए बैठा हूँ
नैतिकता अब भी कही बची है, मर्यादाओ का सिवान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


माना की तुम सही पर मैं भी कहा ख़राब हूँ
व्यक्ति तुम अच्छे, इंसान मैं भी लाजबाब हूँ
शिष्टाचार तुममे तो  मुझमे अब भी है अदाब
सफल आज तुम तो मेरा भी बाकि है शबाब
गलतियां मेरी कुछ, जिनका मूल्य चुकाना है
मेरे अंदर भी राम, अपने कृष्ण को जगाना है
रावण मत समझो मुझे, मुझमे भगवान् अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

 
 
  

Saturday, February 4, 2017

पहचान अभी बाकि है-१० 



चांदी जैसे गाल और सोने जैसे बाल  
भिखमंगो की बस्ती में बस तुम मालामाल
तुझे देखूं तो एक मदहोशी छायी रहती है 
दूर जो होती हो तो नब्ज घबरायी रहती है 
हुस्नपरी तुम बेमिशाल, मैं भी जिगर रखता हूँ
साथ तेरा पाने को  मैं हद से गुज़र सकता हूँ
लकीर का फ़क़ीर मत समझो, मेरे अंदर सुल्तान अभी बाकि है 

मेरी पहचान अभी बाकि है



आओ अब फिर से आरम्भ करे
शुभ का फिर से शुभारम्भ करे
सुनहरा पथ जो पीछे छूट गया
कर्त्तव्य पथ पर कुछ टूट गया
अतीत के ग़मों को क्यों याद करे
उन यादों में क्यों वक्त बर्बाद करे
पीछे मुड़कर देखना नहीं, मैदान बहुत बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

छा चूका है घना अँधियारा
शोला जो चिनगारी से हारा 
घनघोर निराशा छाने लगी 
अभिलाषा मृत हो जाने लगी 
उम्मीद फिर भी मेरे साथ है 
लगता मेरी डोर मेरे हाथ है 
रणछोड़ मत समझो मुझे, मुझमे पार्थ का ज्ञान अभी बाकि  है 
मेरी पहचान अभी बाकि है
  









Tuesday, January 31, 2017

पहचान अभी बाकि है-९ 

क्या लिखूँ, कई बार लिखूँ, किस्से वही बार बार लिखूँ 
इन नशीली आँखों में झांकते अपना सारा संसार लिखूँ
टपके तेरे अंग से कविता, लिखने को बेक़रार लिखूं 
लिखते लिखते गुम हो जाऊ, ऐसा मैं असरदार लिखूं 
चलती फिरती कविता है तू, कविता करना मेरा काम 
कुछ दिनों से नहीं लिखा, पर कविता पर है तेरा नाम
नकारा न समझो कलम को मेरी, इसकी शान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है 


कहाँ सवाँरा रूप प्रिये तुम, कहाँ रही तुम इतने दिन 
रह रह कर पूछे मन, किया तूने क्या इतने दिन?  
आती हो जब सामने तो, हरियाली आ जाती है 
प्रियतमा, तुझे ना देखूं तो मरियली छा जाती है
प्राणप्रिये, तुम सवाल हो,  उत्तर भी तुम्ही लाती हो 
जाती हो तो जाते-जाते प्रश्न अनेक कर जाती हो 
 प्रश्न हैं अस्तित्व सृष्टि का, प्रश्नों का मान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है  


जलकुम्भी सी फैली हुई यादें, यादों में तुम 
डूबते निकलते यादों में, हो जाते  हम गुम
तुम्हारे केसुओं के छाये में बिताये हुए पल
झील सी गहरी आँखों से छलकते हुए जल
यादों की याद नहीं तुझे, जो दें न सोने मुझे
अपने ह्रदय को बर्गलाउ, जैसे भी मोहे सूझे
कैसे भुलाऊ तुझे, तेरी यादों का थान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है  


                                                                  डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 
  
  
  

Monday, January 23, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -८ 

ये वही तुम थे, ये वही थे हम 
खिलखिलाते, न था कोई गम
माँगा जो मैंने एकबार मरहम 
छोड़ दिया, समझ कर बेदम 
कमजोर हुआ हूँ, बेजान नहीं हूँ 
झकझोर दिया है, अंजान नहीं हूँ 
गिरा न समझो मुझको तुम,
मेरी उठान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

मेरे इशारों पर चलती थी शख्शियत तुम्हारी
कदम कदम पे होती थी खातिरदारी हमारी
समयचक्र का खेल, दिखता न मन का मेल
 मेरे खेले बिना ही पूरा होता तेरा हर एक खेल
खेलना छोड़ा है जरा सा, खेल भुला नहीं हूँ
बाजुओ में अब भी है दम, कोई लूला नहीं हूँ
ना  ही समझो मुझे थका हारा,
मेरा कार्य एक महान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

सुना है एक रिश्ते में होती नहीं पूरी जिंदगी
 पर तुमने ही कहा था करोगे ताउम्र बंदगी
जरा सा ओझल ही हुआ था, अस्त नहीं था
अपनों से लड़ा था, बिन बात मस्त नहीं था
भुलाना चाहू पर भूल नहीं पाता हूँ
हर बार यही उत्तर बार बार पाता हूँ
क्यों भूले मुझे तुम जब पता था तुम्हे भी
कि तेरी नज़रों में मेरी शान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुम ही कहते थे ज़िन्दगी गुजरे मेरी बाँहों में
बैठे रहते थे बिछाकर  निगाहे मेरी राहों में 
मैं वही हूँ पर मेरी हर बात से घुटन होती है
उत्साहित होते थे कभी, आज टूटन होती है
अभी है काली रात, अँधेरा घना सा है 
जीवन में है मुश्किलें, मन अनमना सा है
अँधियारा छटेगा, उजाला आने वाला है 
मेरे जीवन का उदयभान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

                                                                                    डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'  

Thursday, January 19, 2017


यादें 

किसी ने पूछा कौन याद आता है, 
अक्सर तन्हाई में
हमने कहा 
कुछ पुराने रास्ते, 
खुलती ज़ुल्फे और 
बस दो आँखें

मेरे ह्रदय ने पूछा क्या याद आता है 
अक्सर तन्हाई में 
हमने कहा 
अपने गालों पर उनके गाल 
उनके होठों की छुवन और 
बस अपने बालों में उनकी उंगलिया 

मेरी तन्हाई ने पूछा कैसे याद आती है 
उस भीड़ में भी तन्हाई की 
हमने कहा 
मुझसे टकराती उनकी गर्म साँसे 
मुझमे सिमटती उनकी गर्म आहे और 
उनमें समाता मेरा पूरा अस्तित्व 


मेरी  आँखों ने पूछा क्या याद आता है 
उन यादों के झरोखों में 
मैंने कहा 
झील सी गहरी आँखे 
संगमरमर सा तरासा बदन और 
यौवन का उभार 

मेरे कानो ने पूछा क्या याद आता है 
उन भूली बिसरि यादों में 
मैंने कहा 
उनके खामोशियों की गूंज 
अपने बदन पे उनकी बाहो की सरसराहट और 
उनके कंठ से गूंजती ठंढी साँसे 

                                                             डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 

Thursday, January 5, 2017

तुम कमाल लगती हो 

इन मस्त नशीली आँखों में, प्राण प्रिये तुम कमाल लगती हो 
गोरी गोरी बांहे, लाल लाल कुर्ती, टमाटर सी लाल लगती हो 

चांदी जैसे गाल और सोने जैसे बाल, सर से पैरो तक निखार 
हम भिखमंगो की बस्ती में सिर्फ तुम ही मालामाल लगती हो

तुम्हे देखने का सब एक मौका ढूंढे, गांव के सारे बच्चे बूढ़े 
सारे के सारे बूढ़े हो गये, सिर्फ एक तुम जवान लगती हो 

अंग अंग से मस्ती छलके, देख के सबकी नज़रे बहके  
चलती फिरती तुम कहानी, गांव में तुम बवाल लगती हो 

हिरनी जैसी आंखे है तेरी, नज़र न हटती तुझसे मेरी 
गजगामिनी चाल है तेरी, प्रिये तुम बेमिसाल लगती हो

 कहाँ सवाँरा रूप प्रिये तुम, कहाँ रही तुम इतने दिन 
रह रह कर पूछे मन, प्रियतमा तुम सवाल लगती हो 












  



Wednesday, January 4, 2017

किस्से वही बार बार लिखूँ



क्या लिखूँ, कई बार लिखूँ, हर बार वही बार बार लिखूँ 
तेरी नशीली आँखों में झांकते अपना सारा संसार लिखूँ 

अब तूँ ही बता मेरे हमसफ़र, मेरे हमराज, मेरे हमराही  
तेरे होठो की छुवन लिखूँ या तेरे यौवनों का उभार लिखूँ

   मुझसे टकराती गर्म सांसे, पसीने से लथपथ मेरी आँखे   
कोई तो बताओ थोड़े से शब्दो में कैसे पूरा संसार लिखूँ 

कुछ पल की खामोशियाँ, फिर एक चिरंतन, गहरी शांति 
तेरे साथ हुए उन सारे निशब्द वार्तालापो की बहार लिखूँ 

तेरा मेरे पास आना, कभी तुझको मनाना, मनाकर मनाना 
विरह की वो पीड़ा लिखुँ या फिर मिलने की झँकार लिखुँ

तेरे ऊपर अपना पूरा उत्तरदायित्व, तुझमे समाता मेरा अस्तित्व
अब तू ही बता इन चाँद शब्दो में कैसे पूरा का पूरा संसार लिखूँ  

                                                                 डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'

Tuesday, January 3, 2017

तुमको चाहते ही रहना, है आदत हमारी

तुमको चाहते ही रहना, आदत है हमारी 
तुम्हारे प्यार को पूजना ही पूजा है हमारी 
तुम भले ही प्यार करो या कुछ और करो 
तुमको पुकारते ही रहना, है आदत हमारी 

भले ही तुम रूठ जाओ,  ना मेरे पास आओ 
पास आने भी ना दो, आउ तो तुम भगाओ 
तुम्हारे पास आते ही रहना, है आदत हमारी 

तुम्हारे केसुओं के छाये में बिताये हुए पल
झील सी गहरी आँखों से छलकते हुए जल 
उन यादो को याद करना, है आदत हमारी 

हमे अब भी याद है, उर में छुपा वो राज है 
जब कहती थी तुम्हारे दिल में मेरा ही राज है 
उन राजों को संजोना, है अब आदत हमारी

जलकुम्भी सी फैली हुई तेरी यादें, यादों में तुम 
डूबते निकलते उन यादों में, हो आते है हम गुम 
उन यादो में डूबते रहना , है अब आदत हमारी  
तुमको चाहते ही रहना, है आदत हमारी

                                                                                             
                                                                                               डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'