Monday, November 7, 2016

पूर्व राष्ट्रपति कलाम जी की जयंती पर एक श्रद्धांजलि  


अलविदा 

सिसक रही है गीता
कुरान रो रहा है
हर हिन्दू, हर सिख 
हर मुसलमान रो रहा है 
क्योकि गिर पड़ा है एक वटवृक्ष  
बोलते-बोलते अचानक धड़ाम से
फिर कभी नहीं उठने के लिए
फिर कभी नहीं लहलहाने के लिए 
वृक्ष जो हमारा गुमान था
आँखों में शोध का उफान था  
वृक्ष जो रत्न था
वृक्ष जो शक्तिपुंज था 
वृक्ष जो कला कुञ्ज था 
 बोले तो भी
खिलखिलाहट बिखेरता था 
बौखलाहट समेटता था 
चीर देता था हर सन्नाटे का सीना
था वो हमारी अंगूठी का नगीना 
सियासत से कोसों दूर
अन्वेषण के अनंत नशे में चूर
वृक्ष अब नहीं उठेगा कभी
अंकुरित होंगे उसके सपने
देशवासियो की आँखों में 
जो थे उसके अपने 
उठेंगी उसकी मिसाइले  
इसी जमीन से
उगलने को जहर 
शान्ति के दुश्मनों के लिए 
बनके बरसेंगी कहर 
वतन के दुश्मनो के लिए 
उन्हें सबक सीखने के लिए
 वृक्ष क्या कभी गिर सकते है? 
गिर कर कभी मर सकते है?
  वृक्ष कभी मरते नहीं
मौसमो से डरते नहीं  
सदैव अंकुरित होते रहते हैं
पल्लवित होते  रहते है 
अपने नए-नए पल्ल्वों के साथ
वे किसी के अब्दुल होते हैं
किसी के कलाम 
अलविदा .अलविदा ,अलविदा

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