बताओ
जाने वाले जा रहे हो तो बताके जाओ !
कि कितनी राते उदास आँखों में काटनी है
कितनी सुबहे अकेलेपन में गुज़ारनी है
कि कितने सूरज सुनसान रास्तो को निहारने है
बताओ कि
याद तुम्हारी आएगी तो क्या करूँगा
बिछड़ के मेरे हमराही कैसे जिया करूँगा
आँख भर आयी तो कैसे रोया करूँगा
तकिये में मुंह छुपा के कैसे सोया करूँगा
बताओ कि
चांदनी रातो में कौन धड़कने सुना करेगा
आँख जो भर आयी तो कौन मोती चुना करेगा
मेरे दोस्त, मैं किस से तेरा गिला करूँगा
बिछड़ के मेरे हबीब किससे मिला करूँगा
बताओ कि
अकेली रातो में वक़्त कैसे गुज़ारना है
खामोस माहौल में तुझको कितना पुकारना है
कितने मौसम जुदाईयोँ में गुज़ारना है
इस अकेलेपन को कब तक स्वीकारना है
बताओ कि
अब मेरी चाल क्या हो?
जबाब क्या हो?
सवाल क्या हो?
जा रहे हो तो बताके जाओ
कि निखारना है या उजड़ना है
अपने आप को कितना सवारना है
जाते जाते बताके जाओ कि
लौटना भी है की नहीं। ....
जाने वाले चले हो तो बताते जाओ
डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
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