पहचान अभी बाकि है-४
मनुष्यों की दौड़, मनुष्यता से हीन
व्यक्ति केंद्रित लोग व्यक्तित्व विहीन
सभ्य लोग रहें यहाँ सभ्यता से हीन
संमृध्दो की बस्ती में संमृद्धि विहीन
सब से विहीन मैं, बाज नहीं आता हूं
इंसान हूँ, इंसानो के ही काम आता हूं
भुलाओ नहीं मुझमे, इंसान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
बातों बातों में बताते थे बातों का राज
किसी बात के लायक न समझो आज
मुझसे ही तो सीखी थी बड़ी बड़ी बाते
राज, साज, नाज, जीवन की गूढ़ बाते
पूरी मेरी हस्ती मेरी मिटाना चाहो तुम
मतलब निकालकर झुकाना चाहो तुम
मत झुकाओ मुझे, मुझमे स्वाभिमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
रात का घना अँधियारा डराता है
बीती चांदनी रातें याद दिलाता है
पूनम जो होती तो चांदनी लपेटता
उम्मीद बातों की किरणे समेटता
उन यादों की याद, याद नहीं तुझे
कोशिश सदैव तेरी, समेट दे मुझे
मत समेटो मुझे, मुझमे जहान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
नमीं ला देती है, आँखों में याद तेरी
खलती है तुझे भी, सदैव कमी मेरी
घुटता रहता हुँ, किससे कहूँ मैं व्यथा
हर शख्स के अधरों पे अपनी कथा
निखरने की चाह, विखरता चला गया
दबे हुए अरमानों से शिहरता चला गया
मत दबाओ मुझे मुझमें अरमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
बातों बातों में बताते थे बातों का राज
किसी बात के लायक न समझो आज
मुझसे ही तो सीखी थी बड़ी बड़ी बाते
राज, साज, नाज, जीवन की गूढ़ बाते
पूरी मेरी हस्ती मेरी मिटाना चाहो तुम
मतलब निकालकर झुकाना चाहो तुम
मत झुकाओ मुझे, मुझमे स्वाभिमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
रात का घना अँधियारा डराता है
बीती चांदनी रातें याद दिलाता है
पूनम जो होती तो चांदनी लपेटता
उम्मीद बातों की किरणे समेटता
उन यादों की याद, याद नहीं तुझे
कोशिश सदैव तेरी, समेट दे मुझे
मत समेटो मुझे, मुझमे जहान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
नमीं ला देती है, आँखों में याद तेरी
खलती है तुझे भी, सदैव कमी मेरी
घुटता रहता हुँ, किससे कहूँ मैं व्यथा
हर शख्स के अधरों पे अपनी कथा
निखरने की चाह, विखरता चला गया
दबे हुए अरमानों से शिहरता चला गया
मत दबाओ मुझे मुझमें अरमान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है
डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'
Very nice......
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