फिर से
एक और संगठन
एक और ड्रामा
एक बार और चंदा
एकता के धंधे में
कोई एकता नहीं है
पर ये धंधा
नहीं होता मंदा
फिर से वही लफ्फाजिया
वही गल्चोचड़े
वही भाषण
भाषण का रासन
कुछ बिल लेना होगा
कुछ बिल देना होगा
कोई अधिवेसन होगा
फिर परिवेषण होगा
प्यार, तकरार मनुहार
फिर चुनाव
किसी की जीत तो
किसी की हार
फिर एक नया संगठन
नया ड्रामा
नया चोला
लेकर चले सब
एकता का डोला
डॉ. रणजीत सिह 'अविकल'
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