Saturday, December 23, 2017

बेकार 

आज मेरी तन्हाई ने 
तन्हाई में आकर कहा 
कसम खाओ
कि कसम न दोगे 


मेरे ह्रदय ने पूछा 
ऐसा क्यों?

तो उसने कहा 
डर लगता है 
इन कसमों से, 
रसमों से, 
वादे, इरादे 
सब बेकार की बातें हैं 

मैंने कहा,
बेकार तो हैं 
बेकारी में ही तो बेकरारी है 
और इस बेकरारी 
का ही तो करार है 
मेरे और तुम्हारे बीच 
जो लाता है हमें खींच 

उसने कहा 
लेकिन बेकार तो बेकार है 
और तुम्हारा भी तो घर बार है 
मुझे बेकार में और 
नहीं होना बेकरार 

मैंने याद दिलाना चाहा 
उन बेकार की घड़ियों को 
जो हमने बेकार की थी
वो सारे बेकार लम्हे 
स्वीकार है 
पर यह सच्चाई अस्वीकार है 

मैंने पूछा 
कुछ याद आया 
कुछ इश्कियां याद आयी 
क्या शिस्कियाँ  याद आयी?

उसने कहा 
धत, बेशरम 
ये भी कोई याद करता है 

मैंने पूछा 
तो तुम्हारा चेहरा लाल क्यों है?
लगता है यादों से मालामाल है 

इतना कहना था कि 
तन्हाई रो पड़ी 
जो दिवार बन रही थी 
वो खो पड़ी 
और कहा 
चलो ना कहीं दूर 
जहाँ कोई आता जाता नहीं  


Saturday, December 2, 2017


कुछ तो सत्यता रही होगी 


कुछ तो रिक्तता रही होगी 
या कमी परिपक्वता की होगी 
यूँ ही तो दहलीज पार कर नहीं जाता 
कोई दर्दे गम किसी से बाँट नहीं जाता 
इन सब में कुछ तो सत्यता रही होगी 

कुछ  तो तमासे हुए होंगे 
कुछ तो हादसे भी हुए होंगे 
यूँ ही तो कोई तमासा दिखता नहीं 
तमाशाई से तमासा बनता नहीं 
इन तमासों में कुछ तो सत्यता रही होगी 

कुछ तो अनुभूतियाँ रही होंगी 
कुछ परिस्थितियां भी रही होंगी 
यूँ ही तो कोई बेवफा होता नहीं  
बेवजह कोई खफा होता नहीं  
बेवफाइयों में भी कुछ तो सत्यता रही होगी

कुछ तो बात रही होगी
कोई बात जो नहीं बनी होगी
यूँ ही तो बात बिगड़ती नहीं
बनते बनाते फिर बिगड़ती नहीं
बगड़ती बातों में बातों की कुछ तो सत्यता रही होगी 

                                                                                    डॉ रणजीत सिंह 'अविकल'