Wednesday, January 4, 2017

किस्से वही बार बार लिखूँ



क्या लिखूँ, कई बार लिखूँ, हर बार वही बार बार लिखूँ 
तेरी नशीली आँखों में झांकते अपना सारा संसार लिखूँ 

अब तूँ ही बता मेरे हमसफ़र, मेरे हमराज, मेरे हमराही  
तेरे होठो की छुवन लिखूँ या तेरे यौवनों का उभार लिखूँ

   मुझसे टकराती गर्म सांसे, पसीने से लथपथ मेरी आँखे   
कोई तो बताओ थोड़े से शब्दो में कैसे पूरा संसार लिखूँ 

कुछ पल की खामोशियाँ, फिर एक चिरंतन, गहरी शांति 
तेरे साथ हुए उन सारे निशब्द वार्तालापो की बहार लिखूँ 

तेरा मेरे पास आना, कभी तुझको मनाना, मनाकर मनाना 
विरह की वो पीड़ा लिखुँ या फिर मिलने की झँकार लिखुँ

तेरे ऊपर अपना पूरा उत्तरदायित्व, तुझमे समाता मेरा अस्तित्व
अब तू ही बता इन चाँद शब्दो में कैसे पूरा का पूरा संसार लिखूँ  

                                                                 डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'

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