Sunday, March 5, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -१३ 



गड़ा हूँ जमीन में, पड़ा पहचानहीन मैं 
कलरव है डाली पर, खुद शब्दहीन मैं 
धुप लगे तुझको, पर सर्द मेरी फ़ितरत 
सर्दी लगे तुझको, तो दर्द मेरी जिगरत 
न कोई बिषाद की तनाएँ क्यों उन्मुक्त  
जकड़ा खुद अँधेरे में पर तुम परिमुक्त 
लहलहा रहे हो तुम, क्योकि मेरा विषपान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

शक्तिपुत्र हूँ मैं, सीने में लिए भक्ति
मृत्युंजय मैं, बाजुओ में बाकि शक्ति
अर्जुन मै, गांडीव मैं, पिनाक भी मैं
राम मै, परशुराम मै, सारंग भी मैं
नव जुग, नव आलोक का पथिक मैं
अनकही बातों का उत्तर हूँ सटीक मैं
वक्त मेरे कुछ दिन तो ठहर, मेरी मुरली की तान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

बादल हूँ आवारा, मैं दीवाना हूँ
अपनी ही मस्ती का मस्ताना हूँ
मालूम नहीं कहाँ से गुज़रना है
ये भी न जानू कहाँ पे बरसना है
भयावह लगूँ, पर जीवन से भरा
रूठजाउ तो सूखा, नहीं तो हरा
पागल मत समझो मुझे, मुझमे सृष्टि का वरदान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

                                                                     
                                                                                  डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'





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