Monday, January 23, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -८ 

ये वही तुम थे, ये वही थे हम 
खिलखिलाते, न था कोई गम
माँगा जो मैंने एकबार मरहम 
छोड़ दिया, समझ कर बेदम 
कमजोर हुआ हूँ, बेजान नहीं हूँ 
झकझोर दिया है, अंजान नहीं हूँ 
गिरा न समझो मुझको तुम,
मेरी उठान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

मेरे इशारों पर चलती थी शख्शियत तुम्हारी
कदम कदम पे होती थी खातिरदारी हमारी
समयचक्र का खेल, दिखता न मन का मेल
 मेरे खेले बिना ही पूरा होता तेरा हर एक खेल
खेलना छोड़ा है जरा सा, खेल भुला नहीं हूँ
बाजुओ में अब भी है दम, कोई लूला नहीं हूँ
ना  ही समझो मुझे थका हारा,
मेरा कार्य एक महान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है

सुना है एक रिश्ते में होती नहीं पूरी जिंदगी
 पर तुमने ही कहा था करोगे ताउम्र बंदगी
जरा सा ओझल ही हुआ था, अस्त नहीं था
अपनों से लड़ा था, बिन बात मस्त नहीं था
भुलाना चाहू पर भूल नहीं पाता हूँ
हर बार यही उत्तर बार बार पाता हूँ
क्यों भूले मुझे तुम जब पता था तुम्हे भी
कि तेरी नज़रों में मेरी शान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुम ही कहते थे ज़िन्दगी गुजरे मेरी बाँहों में
बैठे रहते थे बिछाकर  निगाहे मेरी राहों में 
मैं वही हूँ पर मेरी हर बात से घुटन होती है
उत्साहित होते थे कभी, आज टूटन होती है
अभी है काली रात, अँधेरा घना सा है 
जीवन में है मुश्किलें, मन अनमना सा है
अँधियारा छटेगा, उजाला आने वाला है 
मेरे जीवन का उदयभान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

                                                                                    डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल'  

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