Thursday, June 15, 2017

मेरी पहचान अभी बाकि है -१७ 

तुमने मुझको चढ़ते देखा 
गिरते देखा, लड़ते देखा 
तिल-तिल करके मरते देखा 
पून: लोहे जैसा ढलते देखा 
जीवन की यही कहानी है 
सब अपने में मस्तानी है    
जिन्दा होने की है पहचान, 
और जीवन का निशान यही बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुमने मुझे उलझते देखा
अपने आप सुलझते देखा
बिन बातों के उबलते देखा
कड़वा घूंट निगलते देखा
बिन बैसाखी संभलते देखा
बगिया बीच टहलते देखा
देखे मेरे रूप अनेको पर मेरे
उत्कर्ष का गुणगान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है


तुमने मुझको टूटते देखा
टूट टूट करके जुटते देखा
अभिमन्यु जैसा रण कौशल
चक्रव्यूह का घिरा रणस्थल
चक्रव्यूह से भी निकलते देखा
जयद्रथ का वध करते देखा
अर्जुन का लहू नशों में मेरी
मेरा महान रक्तदान अभी बाकि है
मेरी पहचान अभी बाकि है









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