Tuesday, January 31, 2017

पहचान अभी बाकि है-९ 

क्या लिखूँ, कई बार लिखूँ, किस्से वही बार बार लिखूँ 
इन नशीली आँखों में झांकते अपना सारा संसार लिखूँ
टपके तेरे अंग से कविता, लिखने को बेक़रार लिखूं 
लिखते लिखते गुम हो जाऊ, ऐसा मैं असरदार लिखूं 
चलती फिरती कविता है तू, कविता करना मेरा काम 
कुछ दिनों से नहीं लिखा, पर कविता पर है तेरा नाम
नकारा न समझो कलम को मेरी, इसकी शान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है 


कहाँ सवाँरा रूप प्रिये तुम, कहाँ रही तुम इतने दिन 
रह रह कर पूछे मन, किया तूने क्या इतने दिन?  
आती हो जब सामने तो, हरियाली आ जाती है 
प्रियतमा, तुझे ना देखूं तो मरियली छा जाती है
प्राणप्रिये, तुम सवाल हो,  उत्तर भी तुम्ही लाती हो 
जाती हो तो जाते-जाते प्रश्न अनेक कर जाती हो 
 प्रश्न हैं अस्तित्व सृष्टि का, प्रश्नों का मान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है  


जलकुम्भी सी फैली हुई यादें, यादों में तुम 
डूबते निकलते यादों में, हो जाते  हम गुम
तुम्हारे केसुओं के छाये में बिताये हुए पल
झील सी गहरी आँखों से छलकते हुए जल
यादों की याद नहीं तुझे, जो दें न सोने मुझे
अपने ह्रदय को बर्गलाउ, जैसे भी मोहे सूझे
कैसे भुलाऊ तुझे, तेरी यादों का थान अभी बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है  


                                                                  डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 
  
  
  

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