Saturday, February 4, 2017

पहचान अभी बाकि है-१० 



चांदी जैसे गाल और सोने जैसे बाल  
भिखमंगो की बस्ती में बस तुम मालामाल
तुझे देखूं तो एक मदहोशी छायी रहती है 
दूर जो होती हो तो नब्ज घबरायी रहती है 
हुस्नपरी तुम बेमिशाल, मैं भी जिगर रखता हूँ
साथ तेरा पाने को  मैं हद से गुज़र सकता हूँ
लकीर का फ़क़ीर मत समझो, मेरे अंदर सुल्तान अभी बाकि है 

मेरी पहचान अभी बाकि है



आओ अब फिर से आरम्भ करे
शुभ का फिर से शुभारम्भ करे
सुनहरा पथ जो पीछे छूट गया
कर्त्तव्य पथ पर कुछ टूट गया
अतीत के ग़मों को क्यों याद करे
उन यादों में क्यों वक्त बर्बाद करे
पीछे मुड़कर देखना नहीं, मैदान बहुत बाकि है 
मेरी पहचान अभी बाकि है

छा चूका है घना अँधियारा
शोला जो चिनगारी से हारा 
घनघोर निराशा छाने लगी 
अभिलाषा मृत हो जाने लगी 
उम्मीद फिर भी मेरे साथ है 
लगता मेरी डोर मेरे हाथ है 
रणछोड़ मत समझो मुझे, मुझमे पार्थ का ज्ञान अभी बाकि  है 
मेरी पहचान अभी बाकि है
  









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