Thursday, January 19, 2017


यादें 

किसी ने पूछा कौन याद आता है, 
अक्सर तन्हाई में
हमने कहा 
कुछ पुराने रास्ते, 
खुलती ज़ुल्फे और 
बस दो आँखें

मेरे ह्रदय ने पूछा क्या याद आता है 
अक्सर तन्हाई में 
हमने कहा 
अपने गालों पर उनके गाल 
उनके होठों की छुवन और 
बस अपने बालों में उनकी उंगलिया 

मेरी तन्हाई ने पूछा कैसे याद आती है 
उस भीड़ में भी तन्हाई की 
हमने कहा 
मुझसे टकराती उनकी गर्म साँसे 
मुझमे सिमटती उनकी गर्म आहे और 
उनमें समाता मेरा पूरा अस्तित्व 


मेरी  आँखों ने पूछा क्या याद आता है 
उन यादों के झरोखों में 
मैंने कहा 
झील सी गहरी आँखे 
संगमरमर सा तरासा बदन और 
यौवन का उभार 

मेरे कानो ने पूछा क्या याद आता है 
उन भूली बिसरि यादों में 
मैंने कहा 
उनके खामोशियों की गूंज 
अपने बदन पे उनकी बाहो की सरसराहट और 
उनके कंठ से गूंजती ठंढी साँसे 

                                                             डॉ. रणजीत सिंह 'अविकल' 

1 comment:

  1. याद वो है ही नही आये जो तन्हाई में
    तेरी याद आये तो मेले में अकेला कर दे
    यादें...

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