Tuesday, March 6, 2018


मेरी पहचान अभी बाकि है -२१ 

हर वक़्त, हर घड़ी, भुलाते रहे 
अस्तित्व को मेरे झुठलाते रहे 
रहता था पड़ा मैं एक कोने में 
बोध भी नहीं था अपने होने में 
दबाते रहे तुम ज़मीन में मुझे 
मिट जाऊंगा ये यकीन था तुझे 
पर भूल गए कि बीज हूँ मैं, मेरा लहलहान अभी बाकि है,
मेरी पहचान अभी बाकि है 

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