Tuesday, January 2, 2018

सचिन

ये दौर था जब टीवी पे सिर्फ दूरदर्शन होता था
दूरदर्शन पे शाम को सिर्फ कृषि दर्शन होता था
प्यार में लडकिया मन में मुस्कुराया करती थी 
और एक चिड़िया, अनेक चिड़िया गाया करती थी 
जनसंख्या के कारणों पे चर्चे से हर कोई शर्माता था 
मनोरंजन के साधनो की कमी, हर कोई झुठलाता था 
पर भूगोल का शिक्षक ये भी एक कारण बतलाता था
उसी वक़्त सचिन तुम मैदान में बल्ला लेकर उतरे  
इस देश में मनोरंजन के  मसीहा बनकर उभरे
जिस उम्र भारतीय माँए शाम  ढलने के बाद
या अगर दुकान हो कुछ दूर चलने के बाद 
मोहल्ले की दूकान से दही लाने नहीं भेजती थी
अपने बच्चों को अपने आँचल में सहेजती थी 
तुमने दुनिया भर के गेंदबाजों की धज्जियाँ उड़ाई 
यूनुस, मैकग्राथ, वाल्श जैसे कितनों को धूल चटाई 
मुझे अब भी याद है जब कादिर को तीन छक्के लगाए थे 
और नए बैट की जिद में मैंने पापा से चार थप्पड़ खाये थे 
उनके डांट और थप्पड़ मुझे हिला न सके 
लेकिन तुम्हारी बैटिंग ने दुनिया को हिलाकर रख दिया 
सारे असंभव को संभव बनाकर रख दिया 
तुम रिकॉर्ड तोड़ते रहे  
हम शीशे फोड़ते रहे
तुम अकरम को फोड़ते 
हम गली के वसीम को तोड़ते  
तुम मैन ऑफ़ थे मैच होते 
हम गली के विलेन होते 
लेकिन इसकी परवाह किसको थी 
कोई कुछ भी कहे, फिक्र जिसको थी 
तुम्हारी लम्बी पारी के लिए 
इन्निंग्स से भी लम्बी साझेदारी के लिए 
नास्तिक ईश्वर से दुवाएँ मांगते 
तुम्हारी बैटिंग के बदले सजाएं मांगते 
महिलाएं सीरियल कुर्बान करती 
कुछ तो सबसे बड़ी कद्रदान बनती 
लडके डेट कैंसिल कर घर बैठते 
माँ बाप की नज़रों में सुधर बैठते 
बुजुर्ग भी तुम्हारी पारी के कायल थे 
एक एक छक्के पे जवानों की तरह घायल थे 
ओशो ने कहा था, दर्शक नहीं खिलाडी बनों 
पर सोचता हूँ गर खिलाड़ी तुम सरीखा हो 
तो जिन्दगगी भर दर्शक बने रहना 
कम सौभाग्य की बात नहीं है 

शुक्रिया सचिन, हमें सौभाग्यशाली बनाने के लिए 





   


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